ख़रीद फ़रोख़्त का ज़माना है, यारों और इस दौर में सब कुछ बिकाऊ है । बस ख़रीदने वाला एक अच्छा सा ग्राहक चाहिये । ज़रा से हाथ-पाँव मारो, एक दो इश्तिहार छपवा दो बड़े से किसी अख़बार में – बस, ग्राहक अपने आप खिंचा चला आयेगा । और जब सब कुछ बिकाऊ है ही, तो संगीत भी क्यों न बिके और ख़रीदा जाये ? ये अलग बात है कि इस नये दौर में संगीत का हाट-बाजार पहले लग जाता है, ग्राहकों को आकर्षित करने के लिये इश्तिहार छप जाते हैं, बेचने वाले और ख़रीदने वाले अलग अलग अन्दाज़ में अपने बेचने खरीदने के सिलसिले का गुणगान करने लगते हैं । मौन रहता है तो बस बेचारा कलाकार जिसके बनाये या रिकार्ड किये गये संगीत की बोली जल्द ही लगने वाली है । ये अन्याय नहीं तो और क्या है?
दुख तो इस बात का है कि अब कला के अनैतिक ख़रीद फ़रोख़्त में शामिल होने वालों में एक ऐसा नाम पिछले कुछ दिनों में सामने आया है, जिसे अब तक कलाकारों ने अपना मित्र, अपना हितैषी समझा था । जी हाँ, मुम्बई स्थित एन. सी. पी. ए. अर्थात नेशनल सेंटर फ़ार परफ़ार्मिंग आर्टस् ने अपने संग्रहालय का खजाना बेचने की दृष्टि से बोली लगाने के लिये ग्राहक जुटाने का कार्य जोर शोर से आरम्भ कर दिया है । Read the rest of this entry »











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