December 2005

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न्हात बलकुंवर कुंवर गिरिधारी ।

जसुमति तिलक करत मुख चुंबत आरति नवल उतारी ॥

आनंद राय सहित गोप सब नंदरानी ब्रजनारी ।

जलसों घोर केसर कस्तूरी सुभग सीसतें ढारी ॥

बहोर करत श्रंगार सबे मिल सब मिल रहत निहारी ।

चंद्रावलि ब्रजमंगल रसभर श्रीवृषभान दुलारी ॥

मनभाये पकवान जिमावत जात सबें बलहारी ।

श्रीविट्ठलगिरिधरन सकल ब्रज सुख मानत छोटी दिवारी ॥

आज माई धन धोवत नंदरानी ।

कार्तिक वदि तेरस दिन उत्तम गावत मधुरी बानी ॥

नवसत साज सिंगार अनूपम करत आप मन मानी ।

कुम्भनदास लाल गिरिधर प्रभु देखत हियो सिरानी ॥